काव्य प्रतिभा से संपन्न रश्मि प्रभा जी को मेरा हार्दिक धन्यवाद जिनकी प्रेरणा से मैं www.hindyugm.com के मंच तक पहुची.
यह कविता मेरे दत्तक पुत्र अमितेश को समर्पित है जो अब इस दुनिया में नहीं है.
मेरे घर आयी थी ज़िन्दगी
मेरे घर आयी थी ज़िन्दगी,
वैसे तो पहले भी झाँका करती थी,
किसी झरोखे से,
और कभी थपथपाया करती थी,
खिड़कियों के कपाटों को,
लेकिन मैं ही अपने सन्नाटे के कोहरे में ढकी हुई,
उसे अनसुना, अनदेखा करती रही,
मूक, बधिर, दृष्टिहीन की तरह.
लेकिन बड़ी बिंदास थी वह ज़िन्दगी,
घर के कोने - कोने में समा गयी ज़िन्दगी,
चौके से आँगन तक छा गयी ज़िन्दगी.
मेरे घर आयी थी ज़िन्दगी,
उसकी आँखों में एक चमक थी,
उसकी हँसी में एक अर्थ था,
उसके अस्तित्व में एक आकर्षण था,
उसके नहीं होने पर एक सूनापन था.
मेरे सभी अपनों को अपना बनाया उसने,
उनकी कठिनाइयों में भरोसा दिलाया उसने,
मेरे बोझों को कंधा लगाया उसने,
मुझे फिर से जीना सिखाया उसने.
लेकिन, एक दिन ---
हम सबको छोड़ गयी ज़िन्दगी,
सभी अपनों से नाता तोड़ गयी ज़िन्दगी,
रूठ कर मुँह मोड़ गयी ज़िन्दगी,
सबको बिलखता छोड़ गयी ज़िन्दगी,
ना जाने कहाँ खो गयी ज़िन्दगी
शून्य में जाकर सो गयी ज़िन्दगी
मेरे घर आयी थी ज़िन्दगी
---किरण सिन्धु
10 comments:
हाँ, अमितेश भैया और किशु के जाने के बाद हमारी जिंदगी सच में शुन्य में सो गयी है :(
किसी की याद जब दर्द देती है तो कविता बन जाती है।बस यही तो है जिन्दगी।
Namaste Aunty, pata tha ki Kavita ki link hai par sun nahi pa rahi thi...
Kavita bahoot achchi lagi aur uske peeche ka ehsas dil ko choo gaya.
"Zindagi hai....vaapas zaroor aayegi"
again gr8 work and it flows really well so that one wants to read it till the end
zindgi k rangon ko ujagar karne wali is kavita k liye aapko badhai..........
आदरणीय किरण जी,
एक लम्बे अरसे के बाद आपके भाव, और शब्द कविता के रूप में दिखे. बहुत अच्छी कविता बहुत मार्मिक कविता कही है आपने. सारे बिम्ब बिलकुल नए, अनुभूतिपूर्ण और यथार्थपरक .........
शैलेन्द्र जी का लिखा एक गीत याद आता है जिसे तलत महमूद ने गाया है-
"है सबसे मधुर वह गीत, जिसे हम दर्द के सुर में गाते हैं."
एक अच्छी, समर्थ और जीवंत कविता- !!!!!!
सादर-
आनंदकृष्ण, जबलपुर
मोबाइल : 09425800818
http://www.hindi-nikash.blogspot.com
p.s.- please "word verification" hataa den to achchha rahega-
anand
aapka dard....hum saath hain
aapki ye kavita padhi aur dusari kavitaayen bhi padhi , sab ki sab man ko choone waali hai ... aap bahut shashakt likhti hai ...
aapko dil se badhai
meri kavita " tera chale jaana" padhkar apni amulya rai de...
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html
aabhar
vijay
लेकिन, एक दिन ---
हम सबको छोड़ गयी ज़िन्दगी,
सभी अपनों से नाता तोड़ गयी ज़िन्दगी,
रूठ कर मुँह मोड़ गयी ज़िन्दगी,
सबको बिलखता छोड़ गयी ज़िन्दगी,
ना जाने कहाँ खो गयी ज़िन्दगी
शून्य में जाकर सो गयी ज़िन्दगी
मेरे घर आयी थी ज़िन्दगी
kiran ji sadar prnaam aaj maine pahli baar aap ke blog par aakar aap ki kavita padhi to padhta hi rah gaya bhavo ki itni sunder avhivyakti mai mantr mugdh hun
meri badhayi swikar kare
Pata nahi wo zindgi kab aayegi phir.............. kahan chali gayi zindgi.....
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