Tuesday, June 9, 2009

मासूम प्रतियोगी, अबोध आत्मसम्मान


आजकल टेलिविज़न के अलग - अलग चैनलों पर बच्चों के लिए अनेक प्रकार की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा रही हैं. इन्हीं में कुछ प्रतियोगिताएँ संगीत प्रतिभा से जुडी हुई हैं, या यों कहें कि सिने - संगीत में दक्ष बच्चों के चयन की प्रतियोगिताएँ हैं. नि;संदेह यह कार्य सराहनीय है, क्योंकि छोटी उम्र में ही संगीत - कला के प्रति रुझान रखने वाले बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्राप्त होता है. परन्तु किसी - किसी प्रतियोगिता की चयन - प्रक्रिया दु;खद और कहीं -कहीं आपत्तिजनक है.

प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए आये बच्चे अपने माता - पिता या किसी अभिभावक के साथ घंटों भूख - प्यास, धूप, वर्षा को झेलते हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहते हैं. प्रत्येक कला की तरह संगीत - कला भी एक ऐसी कला है जिसमें मन और शरीर दोनों से साधना की जाती है. घंटों भूख - प्यास, धूप, वर्षा झेलते हुए बच्चे अपनी बारी आने पर क्या अपनी प्रतिभा का सही प्रस्तुतिकरण कर पाते हैं?जिन बच्चों का क्रम पहले आ जाता है वे तो कुछ सहज रहते हैं परन्तु वे बच्चे जिन्हें घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है वे शायद ही अपनी प्रतिभा का सम्पूर्ण और सही प्रस्तुतिकरण करने के लायक रह जाते हैं. बच्चों के साथ उनके अभिभावकों के कष्ट और कभी - कभी उनके आक्रोश भी प्रतिभागियों की क्षमता को प्रभावित करते हैं.

जो प्रतिभागी चयनकर्ताओं के मंच तक पहुँचने में सफल हो जाते हैं उनके साथ चयनकर्ताओं की प्रतिक्रया हमेशा सहज नहीं होती. जो प्रतिभागी पहले दौर में चुन लिए जाते हैं उनका आना तो सफल हो जाता है परन्तु कभी - कभी कम क्षमता वाले प्रतिभागियों के गायन का उपहास भी उडाया जाता है. मेरे दृष्टिकोण से यह बच्चों के आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ करना है. चयनकर्ता यह भूल जाते हैं कि आप जिस बच्चे का मज़ाक उड़ा रहे हैं उसे विश्व - स्तर पर देखा और सुना जा रहा है. जब हम जैसे लोग इसे देख, सुन कर आहत होते हैं तो उन बच्चों पर क्या बीतती होगी? आपके पास से जाने के बाद वे बच्चे अपने दोस्तों और सम्बन्धियों के बीच उपहास का पात्र बनते हैं और उनकी असलफता कुंठा का रूप ले लेती है. अच्छा होता प्रतिभागी और उनके अभिभावक प्रतियोगिता के चयन - प्रक्रिया के नियमों का पालन करें तथा चयनकर्ता प्रतिभागियों की सुविधा और सम्मान दोनों का ध्यान रखें

-- किरण सिन्धु

5 comments:

AlbelaKhatri.com said...

achha vishya
sateek lekh
badhai !

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ said...

यह बच्चों के आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ करना है. चयनकर्ता यह भूल जाते हैं कि आप जिस बच्चे का मज़ाक उड़ा रहे हैं उसे विश्व - स्तर पर देखा और सुना जा रहा है. जब हम जैसे लोग इसे देख, सुन कर आहत होते हैं तो उन बच्चों पर क्या बीतती होगी? आपके पास से जाने के बाद वे बच्चे अपने दोस्तों और सम्बन्धियों के बीच उपहास का पात्र बनते हैं और उनकी असलफता कुंठा का रूप ले लेती है.

आपसे सहमत हूं. आपने एक ज्वलंत समस्या का रूप ग्रहण करते जा रहे विषय पर आपने सफलता पूर्वक ध्यानाकर्षण किया है - शुभकामनायें

अक्षय-मन said...

bahut hi sahi aur prernadayak lekh hai aapne sahi vishy uthaya hai,........
bahut hi sahi likha hai aapne........
अक्षय-मन

Abhishek said...

अभी ज़ी टीवी पर बच्चों वाले प्रोग्राम का एक हिस्सा देखा, मन किया इन टीवी वालों का खून कर दूं. ज़रा से बच्चों के साथ ये लोग क्या कर रहे हैं, लेकिन हम-आप क्या करेंगे, जब उनके मम्मी-पापा शान से बच्चे के 'टैलेंट' पर इतराते हैं!

Abhishek Mishra said...

Aapne prasangik vishay uthaya hai.