Thursday, May 28, 2009

रे मन !


रे मन इतना चंचल क्यूँ है?

समय का पंछी पंख पसारे,
हरदम आगे उड़ता जाये;
लेकिन तू तो वर्षों पीछे,
मुझको अपने संग ले जाये;
यादों में उलझा-भटका कर,
बेसुध कर वही छोड़ आये.

रे मन इतना व्याकुल क्यूँ है?

तू तो सुख-दु:ख का है वाहक,
फिर दु:ख तुझपे हावी कैसे;
अंबर में बिखरी किरणों को,
ढक लेते है बादल जैसे;
हम तो तुझ पर ही आश्रित हैं,
साँसों पर जीवन है जैसे.

रे मन इतना घायल क्यूँ है?

लगता है तू थक सा गया है,
अंतर्द्वंद से लड़ते-लड़ते;
फिर भी तुझको जीना होगा,
सौ-सौ मौते मरते-मरते;
जीवन बस वही रुक जाता,
जिस क्षण तुम हो उससे बिछड़ते.

- किरण सिन्धु

10 comments:

Kanupriya said...

Hmmm...I can't tell you, how much I loved this! Very very beautiful poem ma. Really great one esp. the last line.

जीवन बस वही रुक जाता है,
जिस क्षण तुम हो उससे बिछड़ते.
Sach mein, jeevan man ke bina kuch nahi hai,man na ho toh zindagi ruk jati hai.

re man itna vyakul hai :(

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर.

AlbelaKhatri.com said...

umda!

श्यामल सुमन said...

मन को ही आधार बनाकर कह दी मन की बात।
भाव प्रवाह प्रबल है दोनों सुन्दर है सौगात।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

tellmeyourdreams said...

its like u have written down my thots but yes i dont think so beautifully and flawlessly!!

रश्मि प्रभा... said...

लगता है तू थक सा गया है,
अंतर्द्वंद से लड़ते-लड़ते;
फिर भी तुझको जीना होगा,
सौ-सौ मौके मरते-मरते;
जीवन बस वही रुक जाता है,
जिस क्षण तुम हो उससे बिछड़ते...bahut sundar bhaw didi

tikulicious said...

aapke liye ek bhet


mann ke tar cher diye phir
kisine apne madhur suron se
phir jee karta hai
main ud jaun
sapno ke yun pankh laga ke ..


kanu se aapke blog ka link mila khushi huyi aapse jud kar ..yuhin likhti rahiyega ..

*KHUSHI* said...

Kiranji, aap ki taarif karu yaa aap ki poem ki?? waise Tikuline ye link muje bheja, so hum yaha aa gaye.

bahut hi sundar likha hain aapne, sundar ke alawa agar main kahu ki saufi sadi sach likha hain.

RAJNISH PARIHAR said...

सच में मन पर ना तो अपना काबू है ..और ना ही हम इसे कभी समझ पाते है..!ना जाने कहाँ कहाँ ये भटकता रहता है...

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

लगता है तू थक सा गया है,
अंतर्द्वंद से लड़ते-लड़ते;
फिर भी तुझको जीना होगा,
सौ-सौ मौते मरते-मरते;
जीवन बस वही रुक जाता,
जिस क्षण तुम हो उससे बिछड़ते
बस इतना ही कहूँगा
इतना नहीं सरल,,
ये बड़ा तीक्ष गरल,,
बहुत ही बेहतरीन कविता
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