Thursday, April 8, 2010

कब तक?


कब तक जमीन आग उगलती रहेगी?
कब तक चिताएँ धू - धू जलती रहेंगी?
कब तक घर श्मशान बनते रहेंगे?
दफ़न लाशों से कब्रिस्तान पटते रहेंगे,
सूने आँगन के सन्नाटे पूछते हैं,
कब तक इंसान बेमौत मरते रहेंगे?
- किरण सिन्धु.

छतीसगढ़ में हुए नक्सली हमले में सी.आर. पी.एफ. के ७६ जवान शहीद हो गए. कितनी सुहागनों की माँग सूनी हो गयीं, कितनी बूढ़ी आँखों के सपने छीन गए,ना जाने कितने मासूम बच्चों के सिर पर से पिता का साया छिन गया. सरकार अपना काम कर रही है.राष्ट्रीय सम्मान के साथ इन शहीदों का अंतिम संस्कार हो जायगा. कहीं काँपते बूढ़े हाथ मुखाग्नि देंगे या कब्र पर मिट्टी डालेंगे तो कहीं यही काम नन्हे मासूम हाथों से करवाया जाएगा.ना जाने ये सिलसिला कब तक चलता रहेगा? देश की सीमा पर शत्रुओं से युद्ध करते हुए जवान शहीद होते हैं तो एक अपेक्षित सार्थक वीरगति को प्राप्त होते हैं, किन्तु अपने ही देश में हम शत्रुओं से घिरे हों तो????

2 comments:

Pandit Kishore Ji said...

sach me aakhir kab tak ? aise hamle na sirf desh ke andruni haalat ka pata batate hain balki desh ki suraksha par bhi kai sawaal khade karte hain

ashish said...

Jab tak des ka har ak navjvan apane krtvy ka palan nahi karega.........
ab aap kahe ge may nksaliyo ka pchh le raha hu nahi may nksaliyo ka pchh nahi le rha hu ......
nksaliyo ke sath hmare netao ne har tarf se atya char kiye hai.........